Friday, October 17, 2008

the white tiger

स्व महिंद्रा कपूर साहब का एक गाना है-अंधेरे में जो बैठे है नजर उन पर भी कुछ डालो अरे ओ रौशनीवालो.....!कुछ इसी तरह के जज्बात से प्रेरित हो कर लिखी गई कहानी the white tiger(850 रु) को बुकर पुरुस्कार मिल गया है ! ऑस्ट्रेलिया नागरिकता प्राप्त भारतीय मूल के ३३ वर्षीय अरविन्द अदिगा ने the white tiger लिख कर इस तरह के विचारों को व्यापक स्वरुप दे दिया है !कहानी में नाम और पैसा कामने के आम आदमी के जद्दोजहत को लिखा गया है ! कहानी का नायक बलराम हलवाई उस वंचित जमात से ताल्लुक रखता है जो वर्तमान उपनिवेशवादी ऑफर से वंचित रहा है !एक रिक्शा चालक के बेटे की कहानी जो डेल्ही होते हुए बेंगलोर पहुँचता है और एक कारपोरेट बनने के लिए कई हथकंडो को अपनाता है !बाकलम अरविन्द अदिगा-भारत में दो तरह का देश बसता है -एक रोशन भारत तो दुसरा अन्धकार भारत और वर्तमान आर्थिक व्यवस्था दोनों के बीच की खाई को बढ़ा रहा है !यहाँ आगे बढ़ने के दो ही रस्ते है-अपराध और राजनीति !कुछ आलोचकों के आवाज़ भी आनी शुरू हो गई की भारत की पगड़ी को उछाल कर एक और पुरस्कार ले लिया गया .पश्चिम के लोग भारतीय दशा को पढ़कर खूब एन्जॉय कर रहे है !गौरतलब है की रौशनी मे रहने वाले लोग ने अपनी ही बिरादरी के लोगो को सम्मानित किया है लेकिन अंधेरे में रौशनी डालने की बात तो जरूर हुई है !जब बात मानवता और समानता की हो तो हमें सरहद से ऊपर उठ कर सोचना चाहिए ! बलराम हलवाई भारत के उस अदृश्य वर्ग का नुमाइंदा है जो आर्थिक समृधि में बहुत पीछे है !ये कहना है लेखक महोदय का, लेकिन देखना है की पुरस्कार प्राप्ति के बाद वो किसके नुमाइंदे बन कर रहते है !हालंकि भविष्य के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा है की मैं उन लोगों के बारे में लिखना चाहता हूँ जिनके बारे मे लिखा नही गया है !

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