Sunday, October 12, 2008

उदारीकरण की तानाशाही

किसी के एक आंसू पर हजारों दिल धड़कते है,किसी का उम्र भर रोना यूं ही बेकार जाता है ! अब तो आंसू पोछने मैं भी कोताही बरती जाने लगी है हाय रे उदारवाद !हजारों किसानों की आवाज को टाटा की एक धमकी ने चुप करा दिया ! नंदीग्राम और सिंगुर जैसी घटना भी बेअसर रही भारतीय उदारवाद के सच को नंगा करने में ,क्या ये बलिदान भी बेकार जाएगा ? आखिर क्या होगा इन आवाजों का ?आपके विचार जानने को बेकरार एक दबी सी आवाज !

1 comment:

RAJESH KUMAR said...

साथी अमित जिंदाबाद
चलो कोई तो मिला जो उदारवाद के खिलाफ लड़ाई में सुर मिलाएगा ... अपने आसपास तुम अकेले हो सकते हो ... तुम्हारी आवाज दबी हो सकती है ... लेकिन मेरी ईतनी गारंटी है कि आवाम में आप अकेले नहीं हैं ... और जब भी जरुरत होगी तो कई लोग आज भी झोला उठाए बस क्रांति की बाट ही जोह रहे हैं .....
जिंदाबाद