Monday, October 13, 2008

धन व जन का प्रवाह ...

कौन रोग लग गया देश कों आओ करे विचार !
कई बाँध बांधे भारत ने कितने सेतु बनाए !
सडकें कितनी बनी और कितने है पेड़ लगाए !
भितिया तक बिजली तो पहुंची पर काटे किसने तार !
कौन रोग लग गया देश को आओ करे विचार !
सरकारी आंकडों पर गाँव को बिजली के तार और सडकों पर कोलतार बिछाने की कवायत हमारे चेतनाशक्ति के आने के पहले से चली आ रही है लेकिन अनुभव ये रहा है की उदघाटन के बाद स्थिति और भी बदतर व बेसुध हो कर रह गई १अखिर क्यो न हो किसी की आत्मा का दम घोटकर उसकी काया को कब तक और कहा तक संवारा जा सकता है हालत ये हो गए है की शहर और गाव के बीच की दुरी को अब नापा भी नही जा सकता है !समझ मे ये नही आता की विकाश की यह आस्थाई और असामान्य धारा बंगाल की खाडी में गिरेगी या हडसन की खाडी मे ?
आम तौर पर महानगर मे रहने वाले सफेदपोश आदमी,जिसे जमीन से लगाव का अर्थ भी समझ में नही आता हर कीमत पर विकास का हिमायती है !दरअसल ये दुराव हमारे इतिहास मे दर्ज है शुरुवात तब हुई जब 1800-1850 में इंग्लैंड में औद्योगीकरण का दौर था !इस काल में भारतीय उद्योग का इस कदर ह्रास हुआ की हमारी अर्थव्यवस्था विदेश के हाथो मे काली गई !कार्ल मार्क्स के अनुसार -यह अँगरेज़ घुस्पेथिया था जिसने भारतीय खड्डी और चरखा को तोड़ दिया !पहले इंग्लैंड ने भारतीय सूती माल को यूरोप की मंदी से बाहर कर दिया और भारतीय बाजारों को मानचेस्टर और लंकशयार में निर्मित कपडों से भर दिया !धन के बहिर्गमन का यह खेल विभिन्न रूपों में चलता रहा !
उदारीकरण के रूप में इसका विस्तार हर वस्तु और हर क्षेत्र में फैल गया !धन के बहिर्गमन के साथ-साथ लोग भी गमन करने लगे !ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा गई गाँव उजड़ने लगे और शहर विकराल रूप लेने लगा ..! धन और जन का यह बहिर्गमन बहते घाव के सदृश है .......... ..कोई एहसास तो करें !

5 comments:

aahsas said...

good

पंडितजी said...

ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है. हिंदी में लिखते है,अच्छा लगता है.

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर said...

narayan narayan

उम्मीद said...

आप की रचना प्रशंसा के योग्य है . लिखते रहिये
चिटठा जगत मैं आप का स्वागत है

गार्गी

RAJESH KUMAR said...

sahitya pichha nahee chod raha haiiiii bankingwa kirang karbhee